Jeevan men satya ki pahachan

जीवन के सत्य की पहंचान


आंसू जताते है दर्द कैसा है। 

बेरूखी बताती है हमदर्द कैसा है। 

घमंड बताता है अमीर कैसा है। 

संस्कार बताते है परिवार कैसा है। 

बोली बताती है इंसान कैसा है। 

बहस बता देती है ज्ञान कैसा है। 

नजरे बताती है सूरत कैसी है।

स्पर्श बता देता है नीयत कैसी है। 


Bharat Bandh - A Story of MP Hero, Sajid

भारत बंद के दौरान ऐसा हिम्मत का काम - ऐसे व्यक्ति को सलाम

साजिद भाई की कहानी

Sajid Bhai Apko Salam karte hai

हम ऐसे व्यक्ति को सलाम करना चाहिए जिसमें अपनी जिन्दगी से ज्यादा दूसरों की जिंदगी को बचाने का हिम्मत हो। आज हम ऐसे ही एक व्यक्ति के बारे में बात कर रहे है जो एक ड्राइवर है। इनका नाम साजिद है। भारत बंद के दौरान मध्यप्रदेश में कुछ आंदोलनकारियों ने एक पेट्रोल के टैंकर में आग लगा दिया। उस समय साजिद ने देखा कि पैट्रोल टैंकर में आग लगी है, तब साजिद ने हिम्मत से काम लिया और सोचा कि टैंकर यदि इस रिहायशी इलाके में फटा तो सैकडों लोगों कि जान चली जायेगी। फिर क्या इन्होने हिम्मत से काम लिया और अपनी जान की प्रवाह किये बैगर टैंकर को रिहायशी इलाके से दूर ले जाकर छोड़ा। इस हादसे में इनकी हाथ झुलस गयें। अब अंदाजा लगाइये कि यदि यह पेट्रोल से भरा टैंकर उस रिहायशी इलके में फटता तो कितने मासूम लोग मारे जाते। खुशी की बात यह है कि इन्होने हजारों लोगों की जान बचाई। हमें ऐसे लोगों को सलाम करना चाहिए न कि उसे जिसने भारत बंद का समर्थनकर लोगों के साथ लूट पाट की और हजारों लोगों को तंग किया। 

साजिद भाई आपको हम तहे दिल से सलाम करते है।

दलित होना कोई पाप नहीं, हमारे देश में आज भी बहुत से लोग है जो उच्च जाति में होते हुए भी बहुत गरीब है यहा तक के दो वक्त के रोटी भी बड़ी मुश्किल से जुटा पाते हैं। इसलिए असली दलित तो वह है जो गरीब है और जिसको सही मायने में आरक्षण की जरूरत है। हम ऐसे हजारों दलित भाइयों का सम्मान करते हैं जिन्होने भारत बंद का समर्थन नहीं किया। आज में उन लोगों के लिए एक सुविचार लिख रहा हूं जिन्होने भारत बंद का आवाहन किया और हजारों लोगों को बेवजह परेशान किया। 

आज का सुविचार

जो भगवान का सौदा करता है ,
वो इन्सान की कीमत क्या जाने ,,
जो भारत बंद की बात करता है,
वो अम्बेडकर की कीमत क्या जाने!

एक सोच और एक विचार

भीमराव रामजी आंबेडकर ने कभी नहीं कहा कि भारत बंद की जाएं बल्कि उन्होने तो अपने समय यह कहा होगा कि इतनी मेहनत करों कि भारत से गरीबी मिट जाये। मैं यह बात इसलिए कह रहा हूं कि इनकी शिक्षा जितनी थी उस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि भीमराव रामजी आंबेडकर कितने मेहनती व्यक्ति थे। इनके नाम का गलत मतलब न लगाये इन्होंने सविधान को उस समय के हिसाब से लिखा होगा जिस समय में वो थे। समय के साथ साथ परिवर्तन करना पड़ता है, नहीं तो अंत निकट आ जाता है इसलिए समय और परिस्थिति के साथ बदना सीखें। 

Author - Vinay Singh

Bharat Band Kina Sahi Kitna Galat - भारत बंद, विचारणीय छंद

यह कैसा भारत बंद, जो आपस में लड़ाई करवायें!

 यह कैसा भारत बंद, जो भाई भाई को काटने पर मजबूर हो गये आप। किसी ने सच ही कहा है कि हिंदुओं में यदि जात पात खत्म नहीं हुआ तो इसका फायदा कोई और उठायेगा। इसका जिता जागता उदाहरण है 2 अप्रैल भारत बंद की कहानी। हमें अब एक होने की जरूरत है नहीं तो कुछ लोग जो हमे काफीर कहते हैं वे इसका फायदा उठा लेंगे। हे हिंदुओं आप जात पात को छोड़कर क्या एक जाती नहीं बन सकते जिसका नाम एक ही हो सकता है वह है हिंदुस्तानी। गर्व से कभी ये मत कहों की मैं राजपूत हूं, मैं पंडित हूं, मैं एक शूद्र हूं, मैं एक वैश्य हूं बल्कि यह कहों कि मैं एक हिंदुस्तानी हूं। जिस दिन सब एक होकर गर्व से ये कहेंगे कि मैं एक हिंदुस्तानी हूं उस दिल ये लोग जो भारत के टूकड़े करने के बात करते हैं वे दूम दबाके भाग जायेंगे और भारत फिर से विश्व गुरु कहलायेगा। इसलिए गर्व से कहों मैं एक हिंदू हूं। 

यह कैसा भारत बंद, जो आपस में लड़ाई करवायें!


अम्बेडकर जी को हम भी उतना मानते हैं जितना की आप तो फिर क्यों आपने भारत बंद किया ऐसा करने से क्या अम्बेडकर जी  का सीना चौड़ा हुआ नहीं। सोच के देखियें इससे किसका नुकसान हुआ। मेरे क्रांतिकारी मित्रों क्या ऐसा करने से आप बधाई के पात्र हुए नहीं बल्कि जब आप शाम को ऐसा करके घर पहुंचे होंगे तो कही न कही आपको जरूर महसूस हुआ होगा की ये भारत बंद नहीं हमारा अकल बंद था क्योंकि आपने अपना खुद नुकसान किया। हमारी आपसी फूट का फायदा कौन उठा रहा है जारा आप सोचिये।

मेरे भाइयों क्या आपको पता है कि आपकी इस आंदोलन की वजह से एक एम्बुलेंस में नवजात बच्चे की मृतु हो गई उसमें इसका क्या कसूर था, उसकी माँ अब तक रो रही है क्या आप उसके आंसू को पोछ सकते हैं नहीं ना और वह कब तक रोयेगी ये भी नहीं पता। क्या आप लोग उसके दोषी नहीं है। सोचों तुम एक दिन नवजात रहे होंगे क्या उस दिन ऐसा भारत बंद हुआ होता और खुद न करें आपके साथ ऐसा हदसा हुआ होता तो क्या आप इस धरती पर होते। सोचों मेरे भाई, जरा सोचों कौन लोग इसका फायदा उठा रहे हैं।

उदयमंदिर थाने के उप निरीक्षक महेन्द्र चौधरी को कुछ प्रर्दशनकारियों ने घेर कर पीटा जिसकी वजह से वे शहीद हो गयें। जरा सोचों मेरे भारी उसमें उनकी क्या गलती थी वे तो अपनी नौकरी कर रहे थे। आपके सर पर तो भारत बंद का जनून सवार था इसलिए आपको यह भी नहीं दिखरहा था कि यह भी किसी का भाई होगा। आपने किसको मारा वह भी एक हिंदुस्तानी था और आप भी तो भाई भाई को मारते समय आपको जरा सी भी लजा नहीं आई। ये कैसा भारत बंद था मेरे भाई मुझे कोई समझा दो या खुद सोचो की कौन लोग हमे आपस में लड़ाकर फायदा उठा रहा है।

इस आंदोलन में फायरिंग हुई और इस फायरिंग से एक छात्र की मौत हो गई। इसमें इस छात्र की क्या गलती थी मेरे भाई और न जाने कितने भाइयों को चोट लगी कितने का घर तबाह हो गया। क्या आपको अभी भी लग रहा है कि आपका भारत बंद सफल रहा नहीं। भारत बंद सफल नहीं रहा बल्कि भाई भाई के बीच में नफरत की दरार पड़ गई। बोलो ये दरार कैसे मिटाओंगे मेरे भाई। जिस देश को दिन रात मेहनत करके इस देश की तरकी में योगदान देना चाहिए उस देश के युवा एक दिन भारत बंद करायेंगे ये किसे पता था। भारत बंद होने से सिर्फ हमारा ही नुकसान हुआ उसको समझों मेरे भाई। आपसी लड़ाई झगड़े को छोड़ों और उन लोगों को सबक सिखाओं जो लोग भारत बंद का ऐलान किया। समझो ये लोग तो चाहते हैं कि ये आपस में लड़े ताकि वे इसका लाभ ले सकें। अब आगे क्या लिखूं मेरे इस कविता को पढ़े और समझने कि कोशिश करें कि भारत बंद से क्या लाभ मिला और यह कितना सफल रहा!
क्रांतिकारी मित्रों, बधाइयाँ.. आपका भारत बंद सफल रहा!

विचारणीय छंद

क्रांतिकारी मित्रों, बधाइयाँ.. आपका भारत बंद सफल रहा!

जब सैनिक पे पत्थर बरसे तब भारत बंद कराना था,
जब किसान रोटी को तरसे तब भारत बंद कराना था।

आधी रात जब खुला न्यायालय, तब भारत बंद कराना था,
जब खतरों में था देवालय, तब भारत बंद कराना था।

जब सिक्खों के नरसंहार हुए, तब भारत बंद कराना था।,
जब जेऐनयु में देश के खिलाफ नारे लगें, तब भारत बंद कराना था।

कोई ये तो बताए 2 अप्रेल को किस बात का भारत बंद कराना था

न कोई जात, न कोई पात, हम हैं सिर्फ हिंदुस्तानी

।।जय श्री राम।।  ।।हम है हिंदुस्तानी।।  ।।हम है भारतवासी।।
Author - Vinay Singh

Beti Bachao-Beti Badhao

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

एक सुविचार, जिसाक पालन हम सभी को करना चाहिए

एक सुविचार, जिसाक पालन हमें सभी को करना चाहिए

एक गांव में एक व्यक्ति के घर लगातार 8वीं बार बेटी पैदा हुई तो दमपत्ति ने कहा की नहीं पालेंगे इसे। NGO के दे देते हैं। कितना भी बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का अभियान मोदी जी चला लें पर समाज में आज भी लोग बेटे के बिना लोग अपने परिवार को अधूरा ही समझते हैं। बेटे की चाह में जब एक गरीब दंपत्ति के घर लगातार 8वीं बार बेटी हुई तो उसने उसे एक अनाथालय में छोड़ दिया। 

अब हमें समझ में नहीं आता की ऐसा करने की जरूरत ही क्या थी यदि वह पहले ही दो लड़की होने के बाद संतान नहीं करता तो क्या उसका घर सहीं से चल नहीं सकता था क्या। लेकिन नहीं इस परिवार को तो बेटा चाहिए था सो बेटे के चाह में ऐसा होता चला गया। कुछ लोगों को लाख समझा लो की बेटा और बेटी में कुछ फर्क नहीं होता मगर वे सझने के लिए तैयार नहीं होते। 

आज के समय में ऐसा क्या चीज है जो लड़का कर सकता है लड़की नहीं। आपने ने ऐसे बहुत सी महिलाओं को देखा होगा जो उन्होने किया है शायद वो लड़का नहीं कर सकता। आज भारत तथा अन्य देशों में लड़किया फाईटर प्लेन तक उड़ा रही है। जिस दिन आपने ये समझ लिया की लड़का लड़की में फर्क नहीं होता उस दिन आपके पैस इस प्रकार की नौबत नहीं आयेगी। 

आज के समय को देखकर ऐसा लगता है कि हमारा जमाना चाहे कितना भी मॉडर्न क्यों न हो जाये लेकिन आज भी हमारे इस समाज में लड़का-लड़की का फर्क करना लोग नहीं भूलते। हमारे देश में कई क्षत्रों में तो महिलाओं की दशा इतनी खराब है कि हर महिला यह पूछने पर मजबूर हो जाती है कि क्या हमारी दशा में कब सुधार होगी। हमें कब खुली हवा में सांस लेने की आजादी मिलेगी। क्या हमानें बेटी के रूप में जन्म लेकर कोई पाप किया है। कभी कभी तो महिलायें ये सोचने पर मजबूर हो जाती है कि जन्म लेते ही हमें पिता के अधीन, फिर पति की, बुढ़ी और विधवा होने के बाद अपने बेटे के अधीन होना पड़ता है। इस प्रकार की परिस्थिति में कभी सुधार होगा या नहीं। 

हम अगर लड़कियों को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखेंगे तो उनकी स्थिति में सुधार नहीं होने वाला। हमें समझना होगा की एक स्त्री के कारण ही हमारा जन्म हुआ है और उसको अगर अजादी नहीं दे सकते तो क्या हमें जीने का हक है। जब तक हम लोग बेटा और बेटी को सामान नहीं समझेंगे तब तक  बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ सलोगन का कई मतलब नहीं बनता। हमें इस प्रकार के फर्क करने वाले स्थिति से ऊपर उठना होगा और बेटा-बेटी के फर्क के चश्मे को दूर करना होगा तभी हम एक अच्छे सामाज की कल्पना कर सकते हैं।
Author - Vinay Singh
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