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रीडिंग की समस्याएं

परिभाषा में सूची में वर्णित अनेक समस्याओं पर ध्यान दिया गया है। इसमें जो समस्याएं शामिल नहीं की गई हैं वे एक तरह से पढ़ने की प्रक्रिया के बाहर हैं जैसे- कि हमारे वातावरण के प्रति हमारी प्रतिक्रिया का प्रभाव, दिन का समय, ऊर्जा का स्तर, रूचि, प्रेरणा, आय व स्वास्थ्य। 

रीडिंग की समस्याएं क्यों होती हैं 

इस समय आप यह सवाल पूछ सकते हैं कि क्यों इतने सारे लोगों को ये समस्याएं होती हैं।

रीडिंग की समस्याएं क्यों होती हैं
मस्तिष्क के बारे में हमारे पूर्व ज्ञान में कमी होने के अलावा पढ़ाने के शुरुआती तरीके के प्रति हमारी सोच में इसका जवाब मौजूद है। आपमें से अधिकतर लोग जिनकी आयु पच्चीस वर्ष से ज्यादा होगी और संभवतः आपको ध्वनिक (phonic) या वर्णमाला (alphabet) तकनीक से पढ़ाया गया होगा। दूसरों को शायद इसी तरीके से या देखो और बोलो (look & say) तरीके से सिखाया गया होगा।

सबसे सरल ध्वनिक तरीके में बच्चे को सबसे पहले वर्णमाला सिखाई जाती है, फिर वर्णमाला के हर वर्ण की अलग-अलग ध्वनियां, फिर अक्षरों में ध्वनियों के संयोजन को और फिर सबसे आखिर में शब्द बनाते हुए ध्वनियों का संयोजन करना सिखाया जाता है। इसके बाद उसे धीरे-धीरे अधिक मु्श्किल किताबें दी जाती हैं। आमतौर पर 1 से 10 के क्रम में, जिनके द्वारा वह अपनी गति से आगे बढ़ता जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान वह एक मौन पाठक बन जाता है।

लुक एंड से तरीकों में बच्चों के सामने कार्ड रखकर (इन कार्डों में चित्र बने होते हैं) सिखाया जाता है। दिखाई गई वस्तु का नाम उसके नीचे साफ-साफ लिखा होता है। एक बार जब बच्चा चित्रों व उसके नाम से परिचित हो जाता है तो छपे हुए शब्द को छोड़कर चित्र को उस पर से हटा दिया जाता है। जब बच्चे की शब्दावली बढ़ जाती है तो बच्चों को ध्वनिक तरीके से सिखाने के लिए प्रयोग की गई किताबों के समान ही किताबों की एक सीरीज़ से उन्हें पढ़ाया जाता है और वह एक मौन पाठक बन जाता है।

दो तरीकों के बारे में जो चित्रण किया गया है, वह काफी संक्षिप्त है। इन्हीं के जैसे लगभग पचास और ऐसे तरीके हैं जिनकी मदद से इंग्लैंड व अन्य अंग्रेजी बोलने वाले देशों में पढ़ाया जाता है। पूरे विश्व में यही समस्या मौजूद है।
ऐसा नहीं है कि ये तरीके लक्ष्य प्राप्त करने की दृष्टि से गलत हैं, लेकिन ये किसी भी बच्चे को शब्द का पूरा मायने समझाने की दृष्टि से गलत हैं।

अगर रीड़िंग की परिभाषा के संदर्भ में बात करें तो यह पता चलेगा कि इन तरीकों को प्रक्रिया में केवल पहचानने के स्तर के बारे में बताने व कुछ हद तक आत्मसात करने व अन्तःएकीकरण के लिए बनाया गया है। ये तरीके गति, समय, मात्रा, स्मरण, दोहराना, चयन, अस्वीकृति, नोट लेने, एकाग्रता, प्रशंसा, आलोचना, विश्लेषण, संगठन, प्रेरणा, रूचि, बोरियत, परिवेश, थकान या मुद्रण शैली आदि के बारे में बात नहीं करते हैं।

इसलिए यह बात साफ हो जाती है कि आखिर लोग क्यों इतने व्यापक रूप से इस समस्या से जूझ रहे हैं।

यह नोट करना महत्त्वपूर्ण है कि पहचानने को कभी भी एक समस्या की तरह नहीं बताया गया था, क्योंकि उसे अलग से स्कूली दिनों के शुरुआती दिनों में पढ़ाया गया था। दूसरी सारी समस्याओं को इसलिए बताया गया क्योंकि शैक्षिक प्रक्रिया के दौरान उनको सुलझाने की कोशिश नहीं की गई थी।

आगे आने वाले अध्यायों में इनमें से ज्यादातर समस्याओं को सुलझाने की कोशिश की गई है। आगे आपको आंख की (गति) क्रिया, ज्ञान, व आपके पढ़ने की गति के बारे में बताया जाएगा।

पढ़ते समय आंख की गतिविधियां

पढ़ते समय जब किसी से अपनी अंगुलियों से अपनी आंखों की क्रिया व गति को दिखाने के लिए कहा जाए तो ज्यादातर लोग अपनी अंगुलियों को तुरंत एक की आखिरी लाइन और एक की शुरूआती लाइन से एक सीध में बाएं से दाएं घुमाते हैं। वे सामान्यतः हर लाइन के लिए पौना या एक सेकेंड के बीच का समय लेते हैं। दो मुख्य गलतियां की गई हैं।

गति (Speed)- अगर आंख प्रति सेकेंड एक लाइन जितनी धीमी गति से हिलती है, तो शब्द 600-700 प्रति मिनट की दर से पढ़े जाएंगे। चूंकि एक साधारण लेख को पढ़ने की गति औसतन 240 शब्द प्रति मिनट है, यह देखा गया है कि जो लोग और धीमी गति में पढ़ते हैं, वे भी पहले की अपेक्षा और अधिक तेजी़ से शब्दों को पढ़ लेते हैं।

गतिविधियां (Movement)- अगर आंखें ऊपर दिखाए गए तरीके से आराम से छपे हुए पेज को पढ़ लेती हैं तो वे कुछ भी ग्रहण नहीं कर पाएंगी, क्योंकि आंख तभी किसी चीज़ को साफ रूप से देख सकती है जब वह उसे स्थिरता से देखें। अगर वस्तु स्थिर है, तो उसे देखऩे के लिए आंख का स्थिर होना भी जरूरी है और अगर वस्तु हिल रही है तो उसे देखने के लिए आंख को भी वस्तु के साथ घूमना पड़ेगा। आपके या आपके मित्र द्वारा किया एक सरल-सा प्रयोग इस बात की पुष्टि कर देगा- बिना हिलाए तर्जनी अंगुली को आंखों के सामने रखें और या तो अपनी आंखों को उस वस्तु को देखते हुए महसूस करें या अपने मित्र की आंखों को उस वस्तु को देखते हुए देखें। वे स्थिर रहेंगी। फिर अपनी आंखों के साथ घुमाते हुए अपनी अंगुली को ऊपर, नीचे, दाएं, बाएं घुमाएं। और फिर अपनी आंखों को स्थिर रखते हुए अपनी अंगुली को ऊपर, नीचे, दाएं, बाएं घुमाएं या अपने चेहरे के सामने अपने दोनों हाथों को क्रास रखते हुए आगे लाएं और एक साथ उन्हें देखें भी।  अगर साफ रूप से देखना हैं तो जब वस्तु हिले तो उसके साथ आंखों को हिलना चाहिए।

इन सारे आधारों के अनुसार, यह साफ है कि अगर आंखें शब्दों को पढ़ रही हैं और शब्द स्थिर हो तो आंखों को आगे बढ़ने से पहले हर शब्द पर रुकना होगा। एक सीधी लाइन में बढ़ने की बजाय, वास्तव में आंखें रुकने व तेजी़ से आगे छलांग लगाने के क्रम में घूमती है।


ये छलांगें अपने आप में इतनी तेज होती हैं कि इनमें कोई समय नहीं लगता, पर लक्ष्य-बंधन में ¼ से लेकर सेकेंड लग सकते हैं। एक व्यक्ति जो आमतौर पर एक समय में एक शब्द पढ़ता है-और एक व्यक्ति जो शब्दों व अक्षरों को पढ़ते समय छोड़ता जाता है, उसे उसकी आंख की क्रिया के सरल गणितीय द्वारा उस गति में पढ़ने के लिए  बाधित किया जाता है जो अक्सर 100 शब्द प्रति मिनट होती है और जिसका अर्थ है कि वह जो पढ़ रहा है उसे न तो ठीक से समझ पाएगा न ही वह ज्यादा पढ़ पाएगा।

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