Wednesday, December 19, 2018

मैमोरी पॉवर क्या है? - Memory Power, Hindi thoughts on life

मैमोरी पॉवर क्या है?

मैमारी पॉवर अर्थात याददाश्त शक्ति एक ऐसी नोटबुक मानी जाती है जो हर समय हमारी जेब में रहती है।

मैमोरी एक प्रकार की मानसिक प्रक्रिया मानी होती है। इसमें व्यक्ति किसी भी वस्तु या विषय के बारे में ग्रहण की गई जानकारी आदि को दुबारा याद करके चेतना में लाकर पहचानने की कोशिश करता है। कुछ मनोवैज्ञानिकों के अनुसार हमारे मस्तिष्क में किसी भी तरह की जानकारी आदि मैमोरी चिन्हों (Memory traces) के रूप में जमा होती है। इसी तरह कुछ दूसरे मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि, मैमोरी एक रचनात्मक मानसिक प्रक्रिया है। इन मनोवैज्ञानिकों के अनुसार ग्रहण की गई नॉलेज के स्मरण में मस्तिष्क में कई प्रकार के बदलाव होते हैं।

दो महान मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, पहले सीखी गई अनुक्रियाओं (विषय सामग्री) के चिन्हों को आज के समय में व्यक्त करने को ही मैमोरी कहा जाता है। मस्तिष्क में जमा मैमोरी से संबंधित प्रक्रियाओं में मस्तिष्क में क्या-क्या रासायनिक बदलाव होते हैं- उसको लेकर बहुत से प्रयोग किए गए हैं। एक मनोवैज्ञानिक ने बिल्ली पर एक प्रयोग किया और इस आधार पर पहुंचा कि किसी घटना को दुबारा याद करने के दौरान मस्तिष्क की तरंगों का संबंध मस्तिष्क के किसी एक क्षेत्र विशेष से न होकर मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों से होता है। एक दूसरे मनोवैज्ञानिक और उसके साथियों ने अपनी प्रयोगात्मक रिसर्चों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि घटनाओं की स्मृति प्रक्रिया में संबंधित स्नायुकोषों के न्यूक्लीयशस में आर.एन.ए. (Ribo nucleic acid) में महत्त्वपूर्ण रासायनिक बदलाव होते हैं।
मनुष्य की मैमोरी को एक सिंगल (एकल) अवस्था नहीं कहा जा सकता क्योंकि मनुष्य़ की मैमोरी अलग-अलग अवस्थाएं होती हैं। इनमें से हर अवस्था दूसरी अवस्था के साथ जुड़ी होती है लेकिन फिर भी सबकी अपनी अलग पहचान होती है।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार मैमोरी की तीन अवस्थाएं होती है-
1.     सांवेदिक मैमोरी (याददाश्त) (Sensory Memory),
2.     अल्पकालिक मैमोरी (याददाश्त) (Short-term Memory)
3.     दीर्घकालिक मैमोरी (याददाश्त) (Long-term Memory)
 
1- सांवेदिक मैमोरी (याददाश्त) (Sensory Memory)- सांवेदिक मैमोरी को वस्तुतः मैमोरी (याददाश्त) की शुरुआती अवस्था माना जाता है। सांवेदिक भंडार में सूचनाएं कुछ देर के लिए ही जमा रहती हैं तथा कुछ देर में ही उनका भंडार समाप्त हो जाता है। इसलिए इसे क्षणिक मैमोरी माना जाता है। 
2- अल्पकालिक मैमोरी (याददाश्त) (Short-term Memory)-  अल्पकालिक मैमोरी अर्थात शोर्ट टर्म मैमोरी को दूसरी अवस्था माना जाता है। इस अवस्था में सूचनाएं मस्तिष्क में 30 सेंकड तक जमा रहती है। जैसे कोई व्यक्ति टेलीफोन डायरेक्ट्री (Telephone Directory) में से किसी व्यक्ति का टेलीफोन नंबर उसे फोन करता है लेकिन फोन नहीं मिलता। दूसरी बार फोन नंबर मिलाने के दौरान उस व्यक्ति को टेलीफोन नंबर याद नहीं आता और उसे दुबारा टेलीफोन डायरेक्ट्री में देखना पड़ता है। इसी प्रकार किसी समारोह आदि में एक व्यक्ति का परिचय किसी दूसरे व्यक्ति से कराया जाता है। व्यक्ति उसके नाम को सुनता है। उससे हाथ मिलाता है और कुछ सेकंड में ही उसका नाम भूल जाता है। ये दोनों उदाहरण शोर्ट-टर्म मैमोरी के लिए अंतर्गत आते हैं।
3- दीर्घकालिक मैमोरी (याददाश्त) (Long-term Memory)-  दीर्घकालिक मैमोरी अर्थात लोंग-टर्म मैमोरी को तीसरी अवस्था माना जाता है। यह अवस्था किसी सूचना अथवा अनुभव की हुई घटना का वह पुनः स्मरण (Recall) तथा पहचान (Recognition) है, जो स्मृतिगत अथवा सीख लेने के बाद कई मिनट या कई घंटों या कई दिनों या वर्षों के बाद होती है। यदि कोई व्यक्ति अपने घर पर पिज्जा खाकर घर से निकलने के बाद अपने मित्र को बताता है कि उसने पिज्जा खाया है। विद्यालय से आने के बाद बच्चा अपनी मां को बताता है कि उसे साईंस पढ़ाने वाले टीचर का क्या नाम है या कोई व्यक्ति अपने बचपन के अनुभवों को सुनाता है तो साफ है कि इन तीनों अवस्थाओं में वह दीर्घकालिक स्मृति अर्थात लोंग-टर्म मैमोरी का उपयोग कर रहा होता है। लोंग-टर्म मैमोरी की अवधि कुछ मिनट से लेकर कई वर्षों तक की होती है।
लोंग-टर्म मैमोरी का मूलभूत आधार अभ्यास (Rehearsal) तथा शोर्ट टर्म मैमोरी में जमा सूचना है जिसे अभ्यास के द्वारा लोंग-टर्म मैमोरी में जमा करने की कोशिश होती है। यह अभ्यास दो प्रकार का होता है। पहला अनुरक्षण अभ्यास (Maintenance Rehearsal) और दूसरा व्यापक अभ्यास (Elaborate Rehearsal)। सूचना को वैसे का वैसा ही शोर्ट टर्म मैमोरी में बनाए रखऩे के लिए अनुरक्षण अभ्यास किया जाता है। उदाहरण- एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति का टेलीफोन नंबर याद रखने के लिए अपने मन में दोहराता रहता है। कुछ देर बाद वह नंबर भूल जाता है।
वस्तुतः इस प्रकार का अभ्यास यांत्रिक या सहज क्रियात्मक (Reflex) होता है। इस तरह के अभ्यास से लोंग-टर्म मैमोरी का आधार नहीं बनता। इसके लिए व्यापक अभ्यास अधिक प्रभावशाली रहता है। इस प्रकार के अभ्यास में व्यक्ति शोर्ट टर्म मैमोरी में जमा सूचना को उसके अर्थ, अभिप्राय अथवा उसके साहचर्य के पदों में दोहराता है। इस प्रकार के अभ्यास से लोंग-टर्म मैमोरी का आधार बनता है।
मैमोरी में सूचनाओं का भंडारण कूट संकेतन (Encoding) प्रकार से होता है। पहले प्रकार का कूट संकेतन सांवेदिक प्रतीकों (Sensory Images) के पदों में और दूसरे प्रकार का कूट संकेतन शब्दार्थ भावार्थ के रूप में होता है। इसी के परिणाम स्वरूप लोंग-टर्म मैमोरी के दो रूप होते हैं। एक मैमोरी का और दूसरा जनरल नॉलेज (Knowledge) का। किसी अखबार में किसी समाचार को पढ़कर हमें सूचना की स्मृति कम या अधिक उसी शब्दावली में होती है। टुलविग (1972) ने इसे घटनात्मक मैमोरी (Episodic Memory) का नाम दिया है। 
व्यक्ति के व्यक्तिगत अनुभव घटनात्मक मैमोरी के अंतर्गत आते हैं। ये मैमोरियां (यादें) काल और स्थान से बंधी होती हैं। इसमें आत्मकथात्मक घटनाओं का समावेश होता है। इसके विपरीत लोंग-टर्म मैमोरी शब्दार्थिक (Semantic) होती है। शब्दार्थिक मैमोरी में व्यक्ति के मन या मस्तिष्क के अंदर दुनिया के संबंध में संगठित ज्ञान जमा होता है। इसके अंतर्गत व्यक्ति के शब्द भंडार और उनके उपयोग का तरीका सम्मिलित होता है। शब्दार्थिक मैमोरी घटनाओं, नियमों, सिद्धांतों और व्यक्ति के व्यपदेशों (Strategies) का भंडार है।
हम भूल क्यों जाते हैं (Why do We Forget)- याद रखना और भूलना एक सिक्के के दो पहलू हैं। व्यक्ति जितनी नॉलेज लेता है, मैमोरी में वह उतनी ग्रहण नहीं कर पाता है और मैमोरी में जितनी भंडारित रखता है उसे दुबारा याद (Recall) नहीं कर पाता है। इसलिए भूल जाने का अर्थ नॉलेज को मस्तिष्क में ग्रहण करने में असफलता या मस्तिष्क में ग्रहण नॉलेज के दुबारा याद करने में असफलता है।
  • संभवतः भूलने के क्षेत्र में मनोवैज्ञानिक एबिंगहास ने सबसे पहले प्रयोगात्मक अध्ययन शुरु किए। उनके अनुसार भूलना एक प्रकार की निष्क्रिय मानसिक प्रक्रिया है। अध्ययनों के आधार पर उन्होंने बताया कि ग्रहण की गई नॉलेज को दुबारा याद करने के बीच जितना समय अधिक होगा, उसे भूलना भी उतना ही ज्यादा होगा। भूलने के संबंध में एबिंगहास के कुछ परिणाम इस प्रकार हैं-
  • 20 मिनट के बाद ग्रहण की गई नॉलेज का लगभग 47 प्रतिशत भाग हम भूल जाते हैं।
  •  60 मिनट के बाद ग्रहण की गई नॉलेज का लगभग 53 प्रतिशत भाग हम भूल जाते हैं।
  •  9 घंटे के बाद ग्रहण की गई नॉलेज का लगभग 56 प्रतिशत भाग हम भूल जाते हैं।
  •  24 घंटे के बाद ग्रहण की गई नॉलेज का लगभग 66 प्रतिशत भाग हम भूल जाते हैं।
  •  48 घंटे के बाद ग्रहण की गई नॉलेज का लगभग 72 प्रतिशत भाग हम भूल जाते हैं।
  •  1 सप्ताह के बाद ग्रहण की गई नॉलेज का लगभग 75 प्रतिशत भाग हम भूल जाते हैं।
  • 1 महीने के बाद ग्रहण की गई नॉलेज का लगभग 79 प्रतिशत भाग हम भूल जाते हैं।
इसलिए मनोवैज्ञानिक प्रयोगों के आधार पर कहा जा सकता है कि स्टडी की गई नॉलेज की जितनी मात्रा हम मस्तिष्क में ग्रहण करते हैं, उसकी 66 प्रतिशत नॉलेज एक दिन में भूल जाते हैं अर्थात ग्रहण की गई नॉलेज की 34 प्रतिशत मात्रा ही याद रहती है।
  • भूल जाने से बचने के लिए जरूरत है कि स्टडी की गई नॉलेज को बार-बार दोहराया जाए।
  •  प्रयोगों से पता चला है कि विचारों, चित्रों, रेखाचित्रों को सबसे कम भूला जाता है। इसलिए याद की जा रही नॉलेज को विचारों (Thoughts), कल्पना (Imagination), चित्रों (Diagrams) और रेखाचित्र (Line Diagram) के माध्यम से मस्तिष्क में धारण करें।
आदत मैमोरी पॉवर (Habit Memory)- एक ही तरह के कार्य को लगातार करते रहने से हर क्रिया आदत बन जाती है। उदाहरण के लिए टेलीफोन एक्सचेंज के कर्मचारी को शहर के ज्यादातर टेलीफोन नंबर ज्यादातर उपयोग में आने के कारण ऐसे महसूस होते हैं, जैसे टेलीफोन नंबर दिमाग में न होकर डायल करने वाले की अंगुलियों में धारित हों। कंप्यूटर पर कुछ टाइप करते समय हमारे लिए टाइप करने वाले अंग्रेजी शब्द की स्पेलिंग बताना थोड़ी मुश्किल होता है लेकिन हमारी अंगुलियां उस शब्द की सही स्पेलिंग ही टाइप करती है। इसलिए आप समझ गए होंगे कि अगर एक जरूरी नॉलेज को याद रखना है तो कुछ समय तक उसका बार-बार अभ्यास करने से उसमें निपुणता हासिल की जा सकती है।
छाया-चित्र मैमोरी (Photo Graphic Memory)- मनोवैज्ञानिक प्रयोगों से यह सिद्ध हो चुका है कि बच्चों में छाया-चित्र मैमोरी पॉवर होती है। कोई दृश्य या घटना उनके मस्तिष्क में फोटो कैमरा के समान कैद हो जाती है। किसी 8-10 साल के बच्चे ने कुछ समय पहले ही कोई फिल्म देखी हो तो उसकी कहानी आप बच्चे से पूछिए। बच्चा जब कहानी सुना रहा होता है तब उसके चेहरे के हावभाव को पढ़ने की कोशिश कीजिए। 
आपको उसके हाव-भाव देखकर बहुत अचरज होगा कि कहानी बताते समय उसके हावभाव ऐसे बदल रहे हैं जैसे उसके सामने फिल्म चल रही हो। खासकर उस समय जब बच्चे फिल्म की कहानी के किसी मारधाड़ वाले दृश्य के बारे में बता रहा हो। बच्चा ठीक उसी प्रकार हाथ-पैर चलाकर दृश्य दुबारा पेश कर देता है। लेकिन जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होना शुरु करता है, वैसे-वैसे उसकी छाया-चित्र मैमोरी पॉवर कम होने लगती है या यूं कहें कि भाषा, गणित तथा खेल इत्यादि में उसके ध्यान और एकाग्रचित्तता से उसकी कल्पना शक्ति के उपयोग करने में कमी आ जाती है।
अब आप थोड़ा अपने खुद के बचपन के बारे में सोचना शुरु कीजिए, आप महसूस करेंगे कि आपको बचपन की कई घटनाएं आज भी याद हैं। जैसे उनकी फिल्म चला दी गई और आपके दिलो-दिमाग पर बचपन के दृश्य चल-चित्र की तरह प्रोजेक्ट किए जा रहे हों। आज भी कोई बहुत ही रोने वाला, डराने वाला, रोमांचकारी, भय या उल्लास का दृश्य आपके दिमाग में ठीक उसी प्रकार मौजूद रहता है। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए होता है कि वह भाव दिमाग में अत्यंत प्रभावोत्पादक एवं उत्तेजित करने वाले होते हैं। अचानक किसी वाहन की दुर्घटना से मृत व्यक्ति का दृश्य बहुत दिनों तक बार-बार दिमाग के सामने घूमता रहता है। 

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