Beti Bachao-Beti Badhao

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

एक सुविचार, जिसाक पालन हम सभी को करना चाहिए

एक सुविचार, जिसाक पालन हमें सभी को करना चाहिए

एक गांव में एक व्यक्ति के घर लगातार 8वीं बार बेटी पैदा हुई तो दमपत्ति ने कहा की नहीं पालेंगे इसे। NGO के दे देते हैं। कितना भी बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का अभियान मोदी जी चला लें पर समाज में आज भी लोग बेटे के बिना लोग अपने परिवार को अधूरा ही समझते हैं। बेटे की चाह में जब एक गरीब दंपत्ति के घर लगातार 8वीं बार बेटी हुई तो उसने उसे एक अनाथालय में छोड़ दिया। 

अब हमें समझ में नहीं आता की ऐसा करने की जरूरत ही क्या थी यदि वह पहले ही दो लड़की होने के बाद संतान नहीं करता तो क्या उसका घर सहीं से चल नहीं सकता था क्या। लेकिन नहीं इस परिवार को तो बेटा चाहिए था सो बेटे के चाह में ऐसा होता चला गया। कुछ लोगों को लाख समझा लो की बेटा और बेटी में कुछ फर्क नहीं होता मगर वे सझने के लिए तैयार नहीं होते। 

आज के समय में ऐसा क्या चीज है जो लड़का कर सकता है लड़की नहीं। आपने ने ऐसे बहुत सी महिलाओं को देखा होगा जो उन्होने किया है शायद वो लड़का नहीं कर सकता। आज भारत तथा अन्य देशों में लड़किया फाईटर प्लेन तक उड़ा रही है। जिस दिन आपने ये समझ लिया की लड़का लड़की में फर्क नहीं होता उस दिन आपके पैस इस प्रकार की नौबत नहीं आयेगी। 

आज के समय को देखकर ऐसा लगता है कि हमारा जमाना चाहे कितना भी मॉडर्न क्यों न हो जाये लेकिन आज भी हमारे इस समाज में लड़का-लड़की का फर्क करना लोग नहीं भूलते। हमारे देश में कई क्षत्रों में तो महिलाओं की दशा इतनी खराब है कि हर महिला यह पूछने पर मजबूर हो जाती है कि क्या हमारी दशा में कब सुधार होगी। हमें कब खुली हवा में सांस लेने की आजादी मिलेगी। क्या हमानें बेटी के रूप में जन्म लेकर कोई पाप किया है। कभी कभी तो महिलायें ये सोचने पर मजबूर हो जाती है कि जन्म लेते ही हमें पिता के अधीन, फिर पति की, बुढ़ी और विधवा होने के बाद अपने बेटे के अधीन होना पड़ता है। इस प्रकार की परिस्थिति में कभी सुधार होगा या नहीं। 

हम अगर लड़कियों को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखेंगे तो उनकी स्थिति में सुधार नहीं होने वाला। हमें समझना होगा की एक स्त्री के कारण ही हमारा जन्म हुआ है और उसको अगर अजादी नहीं दे सकते तो क्या हमें जीने का हक है। जब तक हम लोग बेटा और बेटी को सामान नहीं समझेंगे तब तक  बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ सलोगन का कई मतलब नहीं बनता। हमें इस प्रकार के फर्क करने वाले स्थिति से ऊपर उठना होगा और बेटा-बेटी के फर्क के चश्मे को दूर करना होगा तभी हम एक अच्छे सामाज की कल्पना कर सकते हैं।
Author - Vinay Singh

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